बिना सेवा मेवा नहीं | Seva Ka Phal Kahani Lekhan

 बहुत पहले की बात है । जब शाहाबाद में पंडित बाबा हरगोविंद रहा करते थे । उनकी पत्नी का नाम कमला था। वह सीधे , साधे और ईमानदार थे । उनके रहन - सहन सादा और साहीयादा था । गाँव में उनकी अच्छी खासी पकड़ थी । उन्हें गाँव में सभी मान - सम्मान देते थे । 

पंडित व पंडिताइन दोनों प्रसन्न रहते । घर - घर पूजा पाठ करना हरगोविंद का काम था । हरगोविंद को निःसंतान होने का दुःख सालता रहता था । शाहाबाद में ही धनराज साहूकार रहता था । वह पक्का कंजूस था । वह लोगों को सूद पर रुपए देता था । अपने रुपयों को वह कठोरता से वसूलना भी जानता था । 

एक बार हरगोविंद जी भी उससे कर्जा ले ही लिया । पर समय पर धनराज का कर्जा न उतार सके । इसी बात को लेकर धनराज उन पर बरस गुर्रा पड़ा । उसने हरगोविंद को बहुत बुरा - भला बोल दिया । इतना ही नहीं , उसने हरगोविन्द को उनके मकान से ही बाहर निकाल दिया । 

हरगोविंद गाँव से बाहर एक झोंपड़ी बनाकर रहने लगे । एक बार , चौथ व्रत का त्योहार आया । सभी त्यौहार मनाने में लग गए । धनराज की पत्नी ने भी व्रत रखा । उसके घर में मिठाइयाँ बनीं , फल - फूल का प्रबंध हुआ । वहा धूमधाम से पूजा की गई । धनराज ने हरगोविंद को बुलाया और उनसे पूजा करवाई । किन्तु उसने दक्षिना के नाम पर हरगोविंद को कुछ जलेबियाँ और दो केले ही दिए । 

हरगोविंद मुसकराकर दूसरे यजमानों के यहाँ चले गए । कमला ने भी व्रत रखा । उन्होंने गुड़ और तिल मिलाकर चार पेड़े बनाए । आसपास के वृक्षों से कुछ फल - फूल तोड़े । व्रत पूरा हुआ तो पति - पत्नी ने गुड़ के एक - एक पेड़े और कुछ फलों से बना प्रसाद ग्रहण कर लिया। उसके बाद में वे सो जाते है । 

रात में दोनों को किसी आदमी के रोने - कलपने की आवाज सुनाई दी । वे जाग गए । वे अपनी झोंपड़ी से बाहर निकले देखा एक वृद्ध आदमी सड़क पर बिलख - बिलख कर रो रहा है । पूछने पर उसने बताया कि घर वालों ने उसे बाहर निकाल दिया है । कई दिनों से उसे खाने को कुछ भी नहीं मिला है । 

यह सुन पंडित हरगोविंद और कमला का मन पिघल गया । वे बूढ़े आदमी को अपनी झोंपड़ी में ले आए । उन्होंने उसकी खूब सेवा की । उसे खाने के लिए गुड़ के दो पेड़े दिए । वृद्ध आदमी प्रसाद का एक पेड़ा खाने लगा , तो वह पेड़ा उसके हाथ से गिर गया । वह रोने लगा । हरगोविंद को दया आ गई । उन्होंने दूसरे पेड़े को तोड़ - तोड़कर अपने हाथों से वृद्ध आदमी को खिला दिया । फिर खाटिया पर उन्हें आराम करने के लिए सुला दिया । 

कुछ देर बाद बूढ़ा आदमी जाग गया । उठने के साथ ही वह बिलख - बिलख कर रोने लगा । हरगोविंद ने उससे रोने का कारण पूछा , तो वह बताया की- " मेरे पेट में भयानक दर्द हो रहा । " गोविंद और कमला परेशान हो गए । तब जाकर उन्होंने उनका घरेलू उपचार किया तो वृद्ध व्यक्ति को आराम मिला । फिर वह सो गया । 

सुबह हो गई । चिड़ियों की चहचहाहट से हरगोविंद और कमला की आँखें खुल गईं । उन्होंने वृद्ध व्यक्ति का हाल पूछने के लिए खटिया की ओर गए तो देखा । खटिया खाली थी । वहाँ कोई नहीं था । उन्होंने चारों तरफ देखा । वे चौक उठे क्योंकि अब वह झोंपड़ी के स्थान पर एक पक्के घर में थे । घर साफ - सुथरा था । कमरे की दीवारों पर कीमती पोशाकें टंगी थीं ।

खटिया  की जगह पलंग था । जहाँ पर गुड़ के पेड़े गिरे थे वहाँ हीरे - मोलियों का ढेर लग गया था । वहीं पास में गणेशजी की मूर्ति रखी थी । पंडित और पंडिताइन दोनों ने गणेशजी की मूर्ति के आगे नत होकर उनके चरण छुए । दोनों ने समझ लिया कि यह सब कुछ गणेशजी की महिमा है ।

उसी दिन रात में धनराज के यहाँ भी अजीब घटना घटी । एक वृद्ध व्यक्ति उसके घर रोते - कलपते हुए पहुँचा । उसे भूख लगी थी । उसने धनराज से भोजन माँगा । पर उसे धनराज की पत्नी ने खदेड़ कर भगा दिया । वृद्ध व्यक्ति वहाँ से अपमानित होकर कहाँ चला गया , किसी को पता भी नहीं चला । 

उसी रात धनराज के घर में आग लग गई । उसका सब कुछ जलकर स्वाहा हो गया । सेवा का भाव होने के कारण हरगोविंद को सेवा का मेवा मिला गया उधर धनराज के अच्छे दिन बुरे दिन में बदल गए ।

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